Home ब्लॉगआरक्षण पर रार के बीच: आखिर क्या है आरक्षण दिए जाने के पीछे की पूरी कहानी? पूना पैक्ट भी जान लीजिए…

आरक्षण पर रार के बीच: आखिर क्या है आरक्षण दिए जाने के पीछे की पूरी कहानी? पूना पैक्ट भी जान लीजिए…

by News Camp

The News Camp Special: दलितों को मिलने वाले आरक्षण पर इन दिनों रार मची हुई है। इसके लिए आरक्षण हटाओ नाम से संगठन बन गए हैं। इसको हटाने की मांग को लेकर पिछले दिनों जंतर मंतर पर प्रदर्शन भी हुआ। हालांकि इस प्रदर्शन में कई और मामले भी शामिल थे। लेकिन नेपथ्य में मूल आरक्षण हटाने का ही मामला था। दलितों को आरक्षण क्यों दिया गया? क्या ये अमीरी और गरीबी की खाई पाटने भर की बात थी? इस पर होने वाली चर्चा और इसको हटाए जाने का तर्क भी यही ज्यादातर दिया जाता है। जबकि आरक्षण सामाजिक रूप से बनी जातियों के रूप में दरार और भेदभाव के स्वरूप निकलकर आया था। हालांकि यह लंबी बहस का मुद्दा है। The News Camp आज आपको आरक्षण के जन्म की कहानी बताने जा रहा है। पढ़ें संक्षिप्त रूप में पूना पैक्ट की ये कहानी…

पूना पैक्ट (Poona Pact) 24 सितंबर 1932 को पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में महात्मा गांधी और डॉ. बी. आर. आंबेडकर के बीच हुआ एक ऐतिहासिक समझौता था।यह समझौता ब्रिटिश सरकार द्वारा घोषित ‘कम्यूनल अवॉर्ड’ (सांप्रदायिक पंचाट) के विरोध में हुआ था, जिसमें दलितों (तब के ‘दलित वर्ग’) के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र (Separate Electorate) का प्रावधान किया गया था।पूना पैक्ट के मुख्य बिंदुसंयुक्त निर्वाचन क्षेत्र (Joint Electorate): दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया और इसे संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र के तहत लाया गया।सीटों का आरक्षण: प्रांतीय विधानमंडलों में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 147 कर दी गई।

केंद्रीय विधानमंडल में प्रतिनिधित्व:

केंद्रीय विधानमंडल में दलितों के लिए 18% सीटें आरक्षित की गईं।शैक्षणिक और प्रशासनिक अवसर: समझौते में यह भी सहमति बनी कि दलित समाज के लोगों को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में भी उचित अवसर दिए जाएंगे।पृष्ठभूमि और प्रभावब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने जब दलितों को पृथक निर्वाचन क्षेत्र दिया, तो महात्मा गांधी का मानना था कि इससे हिंदू समाज स्थायी रूप से विभाजित हो जाएगा। इसके विरोध में गांधीजी ने यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया।

नौकरियों में आरक्षण और पूना पैक्ट

देश भर में बढ़ते दबाव और हिंदू समाज की अखंडता को बनाए रखने के लिए डॉ. आंबेडकर ने अपनी पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग वापस ली और इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। पूना पैक्ट ने भारतीय राजनीति और संविधान में शोषित-वंचित वर्गों के लिए ‘आरक्षण’ की नींव रखी। दलितों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिलाने में पूना पैक्ट (1932) की भूमिका प्रत्यक्ष (Direct) से अधिक नींव (Foundation) और दबाव नीति के रूप में रही। हालांकि पूना पैक्ट का मुख्य ध्यान राजनीतिक प्रतिनिधित्व (संसद और विधानसभा की सीटों) पर था, लेकिन इसने प्रशासनिक और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का रास्ता हमेशा के लिए साफ कर दिया।

प्रतिनिधित्व के सिद्धांत’ को संवैधानिक मान्यता

पूना पैक्ट से पहले अंग्रेज दलितों को केवल एक सामाजिक सुधार का मुद्दा मानते थे। पूना पैक्ट ने ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस (विशेषकर गांधीजी) दोनों को यह स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया कि दलितों को केवल राजनीतिक अधिकार ही नहीं, बल्कि प्रशासन और नौकरियों में भी आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।

पूना पैक्ट की ‘धारा 8’

पूना पैक्ट के औपचारिक समझौते में नौकरियों से जुड़ा एक स्पष्ट प्रावधान शामिल किया गया था। इसके अनुसार दलित वर्गों (Depressed Classes) के लिए शैक्षणिक योग्यता के आधार पर लोक सेवाओं (सरकारी नौकरियों) में बिना किसी भेदभाव के पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने का हर संभव प्रयास किया जाएगा। इस धारा ने पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर दलितों के लिए ‘नौकरियों में न्यायसंगत हिस्सेदारी’ को एक लिखित राजनीतिक सहमति का रूप दिया।

1935 के अधिनियम और 1943 के कोटा प्रणाली का आधार

पूना पैक्ट के तहत बनी सहमति के कारण ही भारत सरकार अधिनियम 1935 में ‘दलित वर्गों’ को पहली बार ‘अनुसूचित जाति’ (Scheduled Castes) के रूप में आधिकारिक पहचान मिली। इसी समझौते के नैतिक और राजनीतिक दबाव के परिणामस्वरूप आगे चलकर 1943 में डॉ. बी. आर. आंबेडकर (जो उस समय वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम मंत्री थे) ब्रिटिश भारत की केंद्रीय नौकरियों में अनुसूचित जातियों के लिए 8.5% आरक्षण का पहला कानूनी कोटा लागू करवाने में सफल रहे।

संविधान के अनुच्छेद 16(4) की पृष्ठभूमि

जब 1947 के बाद बाबासाहेब आंबेडकर ने भारतीय संविधान का निर्माण किया, तो उन्होंने पूना पैक्ट के समय स्वीकार किए गए ‘प्रतिनिधित्व के सिद्धांत’ को संविधान के अनुच्छेद 16(4) में शामिल किया। यह अनुच्छेद राज्यों को यह अधिकार देता है कि जिन वर्गों का सरकारी नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, उनके लिए पद आरक्षित किए जाएँ।

You may also like