The News Camp, लखनऊ: ऑनलाइन (फेसलेस) लर्निंग ड्राइविंग लाइसेंस (DL) बनवाने की प्रक्रिया में चल रहे बड़े फर्जीवाड़े और सिस्टम की खामियों पर नैशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) पिछले करीब चार साल से चुप्पी साधे रहे। दलालों ने सिस्टम में ऐसी सेंधमारी की कि मुर्दों तक के लाइसेंस जारी कर दिए गए। हद तो तब हो गई जब पिछले साल AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से बने वीडियो के जरिए भी लर्निंग लाइसेंस जारी होने का मामला सामने आया। अब यह पूरा मामला हाई कोर्ट के संज्ञान में आने के बाद इस भ्रष्ट व्यवस्था में सुधार की उम्मीद जगी है।
विभागीय हस्तक्षेप खत्म होने से बढ़ा खेल
फेसलेस व्यवस्था 27 मई 2022 से लागू की गई थी। प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए इसमें से आरटीओ के ‘विभागीय हस्तक्षेप’ को खत्म कर दिया गया था, जो सबसे बड़ी खामी बन गया। असल में, एनआईसी का सॉफ्टवेयर टेस्ट के दौरान असली आवेदक और एआई जनरेटेड वीडियो के बीच फर्क ही नहीं कर पाता है। अधिकारी जांच का आश्वासन देते रहे, लेकिन खामियों को दूर नहीं किया गया।
मोटर वीकल एक्ट की अनदेखी, सिर्फ आधार को मान्यता
लर्निंग डीएल के लिए मोटर वीकल एक्ट के तहत वोटर आईडी, लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी, पासपोर्ट, पे स्लिप, जन्म प्रमाण पत्र और मेडिकल सर्टिफिकेट जैसे कई दस्तावेज मान्य हैं। लेकिन फेसलेस सिस्टम में सिर्फ और सिर्फ आधार कार्ड को ही स्वीकार किया जा रहा है। इसका सबसे बड़ा खामियाजा नौकरीपेशा लोगों को भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि आधार में दर्ज पते वाले जिले में जाकर ही उन्हें प्रक्रिया पूरी करनी पड़ रही है।
जनसुविधा केंद्रों पर लूट और दलालों की चांदी
सिस्टम की नेटवर्क कनेक्टिविटी और अन्य कमियों का फायदा उठाकर दलालों ने लूट मचा रखी है। एक अखबार के स्टिंग ऑपरेशन में खुलासा हुआ था कि जनसुविधा केंद्रों पर लोगों से मनमाने दाम वसूले जा रहे हैं।
एक नजर में समझें दलालों का ‘रेट कार्ड’:
लर्निंग लाइसेंस: असली फीस ₹350 | दलाल वसूल रहे ₹2000-3000
परमानेंट (स्थायी) लाइसेंस: असली फीस ₹1000 | दलाल वसूल रहे ₹5000 तक
लाइसेंस रिन्यूअल: असली फीस ₹400 | दलाल वसूल रहे ₹4000-5000
पता/फोटो/नाम परिवर्तन: असली फीस ₹400 | दलाल वसूल रहे ₹500-1000
द्वितीय प्रति (Duplicate): असली फीस ₹600 | दलाल वसूल रहे ₹500-1000
आवेदकों को रोज झेलनी पड़ रही हैं ये दिक्कतें:
आवेदन अटकना: लखनऊ में हर दिन फेसलेस सिस्टम की वजह से करीब 200 लर्निंग लाइसेंस अटक रहे हैं।
पास होकर भी फेल: सिस्टम की तकनीकी खराबी के कारण टेस्ट पास करने के बाद भी आवेदक को फेल दिखा दिया जाता है।
तकनीकी खामियां: फोटो अपलोड करने में दिक्कत, प्रामाणिकता की पुष्टि में परेशानी और OTP आने में भारी देरी जैसी समस्याएं आम हैं।
राजस्व को चपत: इन तमाम खामियों के चलते हर महीने अकेले लखनऊ आरटीओ (RTO) को करीब 18 लाख रुपये के राजस्व का भारी नुकसान हो रहा है।
परिवहन विभाग में लर्निंग डीएल के लिए दो व्यवस्थाएं (ऑनलाइन फेसलेस और आरटीओ कार्यालय में जाकर) 50-50 फीसदी लागू करने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन इस पर भी अब तक कोई सहमति नहीं बन पाई है।