The News Camp (19 August 2026): सावन का पवित्र महीना चल रहा है। मान्यता है कि इस पावन माह में नॉनवेज नहीं खाना चाहिए। इस बीच भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की एक फोटो वायरल हो रही है, जिसमें वो नॉनवेज खाते दिख रहे हैं। इस फोटो को भड़ास मीडिया के सम्पादक यशवंत सिंह ने फेसबुक पर साझा किया है। उन्होंने अपने अंदाज में तल्ख़ टिप्पणी करते हुए लिखा है कि ‘सावन में मांस ठूस रहा है भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन! भाजपा वाले सबसे बड़े पाखंडी होते हैं। खानपान से लेकर कपड़ा लत्ता पहनावा सब रेगुलेट करना चाहते हैं लेकिन वे ये रेगुलेशन ख़ुद पर लागू नहीं करते। बनेंगे ये सब बड़का धार्मिक लेकिन हरकत देखिए। राम मंदिर का दान पेल जाएँगे। सावन में मांस खाएँगे। इनसे बड़े हिप्पोक्रेट आपको खोजे नहीं मिलेंगे।’ हालांकि इस वायरल फोटो की पुष्टि The News Camp नहीं करता है।

देश की राजनीति में खान-पान और व्यक्तिगत भोजन प्राथमिकताओं को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर नया नहीं है। जब भी किसी विपक्षी नेता के खान-पान से जुड़ा कोई वीडियो सामने आता है, तो सत्तारूढ़ खेमा उसे तुरंत सनातन परंपरा, आस्था और जनभावनाओं से जोड़कर मुद्दा बना देता है। हालांकि, जब ऐसे ही सवाल खुद के नेताओं या सहयोगियों पर उठते हैं, तो वही तीखे तेवर नरम पड़ जाते हैं।

तेजस्वी यादव और राहुल गांधी का मामला: जब बीजेपी ने बनाया मुद्दा
बीते चुनावों और राजनीतिक रैलियों के दौरान राष्ट्रीय जनता दल (RJD) नेता तेजस्वी यादव द्वारा हेलीकॉप्टर में मछली खाने का वीडियो वायरल हुआ था। हालांकि तेजस्वी यादव ने स्पष्ट किया था कि वीडियो नवरात्र से एक दिन पहले का था, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं और प्रधानमंत्री तक ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया था। सावन और नवरात्र के महीनों में मटन या नॉन-वेज खाने को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को भी राजनीतिक घेराबंदी का सामना करना पड़ा। तब सत्ताधारी पार्टी ने इसे बहुसंख्यक आबादी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और “मुग़लिया मानसिकता” का प्रतीक बताकर घेरा था।
बंगाल की परंपरा बनाम राजनीतिक दोहरा मापदंड
पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर भारत की राजनीति में भी खाने की पसंद अक्सर बहस का केंद्र बनती रही है। बंगाल में मांसाहार और मुख्य रूप से मछली खाना सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा माना जाता है। वहां चुनाव प्रचार के दौरान कई बीजेपी नेताओं को स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं का हवाला देते हुए मछली खाते देखा गया। विरोधी दलों ने तब तंज कसा था कि उत्तर भारत में जो पार्टी नॉन-वेज के नाम पर सख्त रुख अपनाती है, वही पार्टी क्षेत्रीय चुनावों में वोट साधने के लिए अलग पैमाना अपनाती है।
हालिया दावों से गर्म हुआ सियासी माहौल
अब सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में बीजेपी के नेताओं और नव-नियुक्त पदाधिकारियों को लेकर विरोधी दल लगातार निशाने साध रहे हैं। सावन के महीने में खान-पान से जुड़े दावों और सोशल मीडिया पोस्ट्स को लेकर विपक्षी दल बीजेपी की नीति और कथनी-करनी में अंतर पर सवाल खड़े कर रहे हैं। विपक्ष का सीधा आरोप है कि बीजेपी ‘फूड पॉलिटिक्स’ का इस्तेमाल सिर्फ अपनी सुविधा के अनुसार करती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में भोजन केवल एक निजी चुनाव है, लेकिन जब इसे धर्म और चुनाव से जोड़ा जाता है, तो दोहरा रवैया साफ दिखाई देने लगता है। जब तक विपक्षी नेता की थाली का खाना राष्ट्रीय बहस का विषय बनता रहेगा, तब तक खुद के पाले में उठने वाले सवालों से बचना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होगा।