Home Healthदक्षिण एशियाई लोगों की आंत का माइक्रोबायोम दुनिया से अलग, डायबिटीज और मोटापे के इलाज में मददगार बनेगी नई रिसर्च

दक्षिण एशियाई लोगों की आंत का माइक्रोबायोम दुनिया से अलग, डायबिटीज और मोटापे के इलाज में मददगार बनेगी नई रिसर्च

by News Camp

The News Camp, लखनऊ 30 August 2026: हम क्या खाते हैं, कैसे रहते हैं और किस माहौल में पले-बढ़े हैं, इसका असर सिर्फ शरीर के वजन पर ही नहीं बल्कि हमारी आंत (गट) में मौजूद खरबों सूक्ष्मजीवों (माइक्रोबायोम) पर भी पड़ता है। हाल ही में हुए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में सामने आया है कि दक्षिण एशियाई लोगों का गट माइक्रोबायोम दुनिया के अन्य हिस्सों से बिल्कुल अलग है। इतना ही नहीं, दक्षिण एशिया के अलग-अलग समुदायों में भी इन माइक्रोब्स की संरचना अलग पाई गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज आने वाले समय में मोटापे और डायबिटीज जैसी बीमारियों के सटीक इलाज व व्यक्तिगत पोषण (Personalized Nutrition) में बड़ा हथियार साबित होगी।*

575 लोगों के डेटा से 10 समुदायों की तस्वीर

बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (बीएसआईपी), लखनऊ के वैज्ञानिक डॉ. नीरज राय की अगुआई में हुए इस शोध में भारत और श्रीलंका के 10 अलग-अलग सांस्कृतिक व भौगोलिक समुदायों के 575 स्वस्थ वयस्कों के सैंपल जुटाए गए। अब तक वैश्विक डेटाबेस में दक्षिण एशियाई लोगों के नमूने बहुत कम थे, लेकिन इस अध्ययन ने उपलब्ध नमूनों की संख्या को करीब 20 गुना बढ़ा दिया है। शोधकर्ताओं ने ‘SAMBAR’ (साउथ एशियन माइक्रोबायोम अरे) डेटासेट तैयार कर इसकी तुलना दुनिया के अन्य चार बड़े क्षेत्रों के डेटा से की, जिसमें दक्षिण एशियाई नमूने पूरी तरह अलग पाए गए।

शहरीकरण का असर हर समुदाय पर अलग

रिसर्च का एक अहम निष्कर्ष यह है कि शहरीकरण का आंत के माइक्रोबायोम पर पड़ने वाला असर सभी समुदायों में एक जैसा नहीं है। कुछ समुदायों में शहर में रहने वालों के खान-पान (गेहूं, दही व बाजार के सामान) के कारण माइक्रोबियल बदलाव साफ दिखे, जबकि कुछ अन्य समुदायों में ग्रामीण और शहरी समूहों के बीच बहुत कम अंतर पाया गया।

मेगामोनास और लैक्टोज पचाने से जुड़ा खास कनेक्शन

अध्ययन में ‘मेगामोनास’ नामक जीवाणु की मात्रा दक्षिण एशियाई आबादी में अधिक पाई गई, जिसका सीधा संबंध शहरी जीवनशैली से मिला। इसकी ज्यादा मौजूदगी ब्लड ग्लूकोज बढ़ने से भी जुड़ी है। इसके अलावा, गेहूं और दही के अधिक सेवन से आंत में कुछ खास बैक्टीरिया (Bifidobacterium आदि) बढ़ते देखे गए। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह बदलाव उन लोगों को दूध और लैक्टोज पचाने में मदद करता है, जिनमें इसे पचाने की आनुवंशिक क्षमता कम होती है।

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