The News Camp, लखनऊ (20 August 2026): शरीर में शुगर (ग्लूकोज) का बढ़ा हुआ स्तर केवल डायबिटीज तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह दिमाग की नसों को भी नुकसान पहुंचा सकता है। सीएसआईआर-नेशनल बॉटनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (NBRI), लखनऊ के वैज्ञानिकों ने इस समस्या से निपटने का एक नया और असरदार तरीका खोज निकाला है। शोध में सामने आया है कि हल्दी में मौजूद करक्यूमिन (Curcumin) को अगर ‘नैनो’ रूप में दिया जाए, तो यह दिमाग को ग्लूकोज के तनाव और पार्किंसन जैसी बीमारियों के खतरे से बचा सकता है। यह शोध वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित ‘जर्नल ऑफ कॉमर्स लाइब्रेरी साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी’ में प्रकाशित हुआ है।
साधारण हल्दी क्यों नहीं हो पाती पूरी असरदार?
हल्दी का करक्यूमिन अपनी एंटी-ऑक्सीडेंट और दिमाग की कोशिकाओं को सुरक्षा देने (न्यूरोप्रोटेक्टिव) की क्षमता के लिए जाना जाता है। समस्या यह है कि जब हम साधारण हल्दी खाते हैं, तो हमारा शरीर उसे पूरी तरह सोख नहीं पाता और वह जल्दी टूट जाता है।
इस रुकावट को दूर करने के लिए NBRI के वैज्ञानिकों ने करक्यूमिन को ‘गम अरेबिक’ (एक प्राकृतिक गोंद) के बेहद सूक्ष्म नैनो-कणों में बंद (पैक) कर दिया। इस नैनो-तकनीक से करक्यूमिन की कोशिकाओं तक पहुंच चार गुना तक बढ़ गई।
लैब टेस्ट: छोटे से कीड़े पर बड़ा प्रयोग
वैज्ञानिकों ने इस शोध के लिए Caenorhabditis elegans नाम के एक बेहद छोटे कृमि (कीड़े) का सहारा लिया। दिमाग की उम्र बढ़ने और नसों की बीमारियों को समझने के लिए इस कीड़े का इस्तेमाल किया जाता है।
- उम्र पर असर: जब इस कीड़े को ज्यादा ग्लूकोज वाली खुराक दी गई, तो शरीर में तनाव बढ़ने के कारण उसकी औसत उम्र 28 दिन से घटकर केवल 16 दिन रह गई।
- साधारण करक्यूमिन का असर: साधारण हल्दी/करक्यूमिन देने पर उम्र थोड़ी बढ़कर 23.5 दिन हुई।
- नैनो-करक्यूमिन का कमाल: वहीं जब नैनो-करक्यूमिन दिया गया, तो कीड़ों की औसत उम्र बढ़कर 30.7 दिन तक पहुंच गई—जो सामान्य से भी बेहतर थी।
नैनो-करक्यूमिन ने दिमाग में क्या बदलाव किए?
- हानिकारक प्रोटीन का जमाव रोका: पार्किंसन बीमारी में ‘अल्फा-सिन्यूक्लिन’ नाम का प्रोटीन दिमाग में गलत तरीके से जमा होने लगता है। नैनो-करक्यूमिन ने इस खराब प्रोटीन के जमाव को स्पष्ट रूप से कम किया।
- कोशिकाओं की ‘सफाई व्यवस्था’ की तेज: इसने कोशिकाओं की खुद को साफ करने की क्षमता (ऑटोफैगी) को चालू किया और जमा हुई फालतू वसा (फैट) को कम किया।
- फ्री-रेडिकल्स का खात्मा: हाई शुगर से कोशिकाओं में बनने वाले हानिकारक अणुओं (ROS) को कम करके कोशिकाओं की ऊर्जा मशीनरी (माइटोकॉन्ड्रिया) को स्वस्थ रखा।
वैज्ञानिकों की राय: हालांकि यह शोध अभी लैब में कृमियों और इंसानी कोशिकाओं पर हुआ है, इसलिए इसे सीधे तौर पर पार्किंसन का पक्का इलाज नहीं माना जा सकता। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह भविष्य की दवाओं के लिए एक बेहद मजबूत और उम्मीद जगाने वाली दिशा है, जिसके लिए इंसानों पर आगे के परीक्षण जरूरी हैं।
साधारण करक्यूमिन की दिक्कत क्या है:
हल्दी का करक्यूमिन पहले से ही अपने एंटीऑक्सिडेंट और न्यूरोप्रोटेक्टिव गुणों के लिए जाना जाता है। दिक्कत यह है कि शरीर में पहुंचने के बाद इसका अवशोषण कम होता है और यह तेजी से टूट जाता है। यानी फायदा देने वाला पदार्थ शरीर और कोशिकाओं तक उतनी मात्रा में नहीं पहुंच पाता। शोधकर्ताओं ने इसी समस्या को दूर करने के लिए करक्यूमिन को गम अरेबिक से बने नैनो-कणों में पैक किया।
छोटे से कीड़े पर बड़ा प्रयोग: शोध में Caenorhabditis elegans नाम के बेहद छोटे कृमि का इस्तेमाल किया गया। यह वैज्ञानिकों के लिए उम्र बढ़ने और न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों की प्रक्रियाओं को समझने का मॉडल है। कृमियों को ज्यादा ग्लूकोज देकर ऐसा वातावरण बनाया गया, जिसमें न्यूरोनल तनाव और पार्किंसन से जुड़े बदलाव देखे जा सकें। इसके बाद साधारण करक्यूमिन और नैनो-करक्यूमिन के असर की तुलना की गई। नतीजे चौंकाने वाले रहे। ज्यादा ग्लूकोज वाले वातावरण में कृमियों की औसत उम्र करीब 28 दिन से घटकर 16 दिन रह गई।
वहीं नैनो-करक्यूमिन दिए गए कृमियों की औसत उम्र करीब 30.7 दिन रही। साधारण करक्यूमिन से यह करीब 23.5 दिन थी।दिमाग में क्या हो रहा था: शोधकर्ताओं ने पार्किंसन से जुड़े अल्फा-सिन्यूक्लिन नाम के प्रोटीन के जमाव को भी देखा। आसान भाषा में समझें तो जब यह प्रोटीन गलत तरीके से जमा होने लगता है तो तंत्रिका कोशिकाओं के लिए परेशानी पैदा कर सकता है। ज्यादा ग्लूकोज में इसका जमाव बढ़ा, लेकिन नैनो-करक्यूमिन देने पर इसमें स्पष्ट कमी देखी गई।
इतना ही नहीं, नैनो-करक्यूमिन ने कोशिकाओं में बनने वाले रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज (ROS) यानी ऐसे अणुओं को भी काफी कम किया, जो ज्यादा मात्रा में कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। मानव न्यूरोब्लास्टोमा कोशिकाओं के प्रयोग में ज्यादा ग्लूकोज से ROS बहुत बढ़ गया था, जबकि नैनो-करक्यूमिन के बाद यह स्तर नियंत्रण समूह के करीब पहुंच गया। शोध में यह भी पाया गया कि नैनो-करक्यूमिन ने कोशिकाओं की ‘सफाई व्यवस्था’ यानी ऑटोफैगी को सक्रिय किया, माइटोकॉन्ड्रिया की सेहत बेहतर की और कोशिकाओं में जमा अतिरिक्त वसा को कम किया। हालांकि इसे अभी इंसानों में पार्किंसन का इलाज नहीं कहा जा सकता। शोध मुख्य रूप से कृमियों और लैब में विकसित मानव कोशिकाओं पर हुआ है। वैज्ञानिकों ने भी इसे संभावित उपचार की दिशा बताया है और इंसानों में इस्तेमाल की क्षमता तय करने के लिए आगे के अध्ययन जरूरी बताए हैं।