Home HealthTB के बैक्टीरिया की पहचान, BBAU के इस शोध से मरीजों को मिली नई उम्मीद

TB के बैक्टीरिया की पहचान, BBAU के इस शोध से मरीजों को मिली नई उम्मीद

by News Camp

The News Camp, लखनऊ (21 August 2026): बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (BBAU), लखनऊ के वैज्ञानिकों ने टीबी (तपेदिक) के इलाज से जुड़ी एक बेहद अहम कामयाबी हासिल की है। रिसर्च टीम ने टीबी के बैक्टीरिया में एक ऐसे छिपे हुए ‘ड्रग पंप’ (आणविक पंप) की पहचान की है, जो दवा को बैक्टीरिया के अंदर असर करने से पहले ही बाहर फेंक देता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस खोज से दवा-प्रतिरोधी (ड्रग-रेसिस्टेंट) टीबी के खिलाफ लड़ाई में एक नई और मजबूत रणनीति बनाने में मदद मिलेगी।यह रिसर्च BBAU के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के डॉ. युसूफ अख्तर और प्रो. दिनेश राज मोदी के मार्गदर्शन में पीएचडी छात्रा दीप्ति धूसिया ने की है। उनकी यह महत्वपूर्ण स्टडी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘प्रोटींस: स्ट्रक्चर, फ़ंक्शन, एंड बायोइन्फ़ॉर्मेटिक्स’ में प्रकाशित हुई है।

कैसे काम करता है बैक्टीरिया का यह ‘सुरक्षा कवच’?

टीबी पैदा करने वाला जीवाणु (माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस) शरीर में पहुंचने के बाद दवाओं से बचने के लिए चालाकी दिखाता है। रिसर्च टीम का मुख्य ध्यान ‘Rv0191’ नाम के एक प्रोटीन पर था, जो बैक्टीरिया की बाहरी परत पर मौजूद रहता है।वैज्ञानिकों ने पाया कि जब मरीज को टीबी की पहली पंक्ति की दवा ‘पायराज़िनामाइड’ (PZA) दी जाती है, तो यह ‘Rv0191’ प्रोटीन एक पंप की तरह काम करने लगता है। यह दवा को बैक्टीरिया की कोशिका के अंदर टिकने ही नहीं देता और उसे बाहर धकेल देता है। इस प्रक्रिया को ‘ड्रग इफ्लक्स’ कहते हैं। जब दवा बैक्टीरिया के अंदर रुकेगी ही नहीं, तो वह बेअसर साबित होने लगती है और मरीज पर दवा का असर होना बंद हो जाता है।

कंप्यूटर सिमुलेशन से खुला बैक्टीरिया की ‘चालाकी’ का राज

रिसर्च के दौरान टीम ने एडवांस कंप्यूटर मॉडल (मॉलिक्युलर डॉकिंग और सिमुलेशन) का इस्तेमाल किया। उन्होंने पाया कि यह प्रोटीन कोई स्थिर ढांचा नहीं है, बल्कि यह लगातार अपना आकार बदलता रहता है।

आकार बदलना: जब दवा इसके संपर्क में आती है, तो एक खास केमिकल बदलाव के कारण प्रोटीन का आकार बदलता है।

अंदर से बाहर का रास्ता: यह एक बंद सुरंग जैसा रास्ता खोलता है और दवा को पकड़कर बैक्टीरिया के भीतर से बाहर की तरफ फेंक देता है।

अहम बात: दवा बैक्टीरिया को कितनी मजबूती से पकड़ती है, उससे ज्यादा फर्क इस बात से पड़ता है कि यह ‘पंप’ कितनी तेजी से दवा को बाहर निकाल पाता है।

दवा बदलने की जरूरत नहीं, बस ‘पंप’ को करना होगा जाम

रिसर्च की मुख्य लेखिका दीप्ति धूसिया और डॉ. युसूफ अख्तर ने बताया कि इस स्टडी से हमें यह समझने में मदद मिली है कि दवा जुड़ने के बाद बैक्टीरिया के अंदर क्या हरकत होती है।अब वैज्ञानिकों का लक्ष्य ऐसी नई तकनीक या अणु (Molecules) विकसित करना है जो इस ‘पंप’ (Rv0191) के काम को ब्लॉक या पूरी तरह जाम कर सकें। अगर इस पंप को रोक दिया गया, तो मरीज को दी जाने वाली पुरानी और सस्ती दवाएं ही बैक्टीरिया के अंदर बनी रहेंगी और उसे खत्म कर सकेंगी। इससे नई दवाएं खोजने के बजाय मौजूदा दवाओं को ही फिर से असरदार बनाया जा सकेगा।

भारत के लिए क्यों बेहद खास है यह खोज?

डब्ल्यूएचओ (WHO) की रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में दवा-प्रतिरोधी टीबी (MDR-TB) का सबसे ज्यादा बोझ भारत पर है। दुनिया भर में MDR-TB के कुल मामलों में से अकेले 32% मामले भारत में हैं। दवा प्रतिरोधी टीबी के मरीजों में से केवल 71% ही पूरी तरह ठीक हो पाते हैं, क्योंकि उन पर दवाएं बेअसर होने लगती हैं।BBAU की इस शोध से भविष्य में ऐसी दवाएं तैयार की जा सकेंगी, जो टीबी के बैक्टीरिया के इस ‘पंप सिस्टम’ को ही तबाह कर देंगी। BBAU के कुलपति प्रो. आर. के. मित्तल और डीन प्रो. संगीता सक्सेना ने इस सफलता पर पूरी रिसर्च टीम को बधाई दी है।

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